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रक्षाबंधन 2021 : रक्षाबंधन कब है ? दिनांक, मुहूर्त और रक्षाबंधन का इतिहास

रक्षाबंधन 2021 में 22 अगस्त दिन रविवार को होगा। इस दिन रक्षाबंधन बांधने का मुहूर्त सुबह के 6:14 से रात के 5:33 तक का है। जबकि 2022 में  रक्षाबंधन  का त्यौहार 12 अगस्त को मनाया जाएगा।

 

रक्षाबंधन 2021

अपने भाई के लिए डाक द्वारा राखी भेज दें। इस त्यौहार पर लोगो को whatsapp पर रक्षाबंधन शायरी और फोटोज भेज कर रक्षाबंधन  को मनाये (रक्षाबंधन 2021 शायरी CLICK HERE) । अपने भाई या बहन के पास वीडियो कॉल करके बातें करें और ऑनलाइन ही उपहार भी दें दें।

 
                                                        रक्षाबंधन  2021 में 22 अगस्त दिन रविवार को होगा। इस दिन रक्षाबंधन बांधने का मुहूर्त सुबह के 6:14 से रात के 5:33 तक का है। जबकि 2022 में  रक्षाबंधन  का त्यौहार 12 अगस्त को मनाया जाएगा।
 

रक्षाबंधन का मतलब

 

रक्षाबंधन  दो शब्दो से मिलकर बना हुआ है। रक्षा और बंधन जिसका मतलब है कि मुसीबत आने पर रक्षा करने की जिम्मेदारी। जिसमे भाई बहन को हर मुसीबत में रक्षा करने का वचन देता है। रक्षाबंधन  को राखी नाम से भी जाना जाता है।  रक्षाबंधन  का त्यौहार श्रावण की पूर्णिमा को होता है। इसलिए इसे सलूनो या श्रावणी के नाम से भी जाना जाता है। आपने रक्षाबंधन के त्यौहार को फिल्मो में भी देखा होगा और उसके महत्व को अच्छी तरह जानते होंगे।

रक्षाबंधन कब मनाया जाता है 

 रक्षाबंधन  का त्यौहार हिन्दू और जैन धर्म मे मनाया जाता है।  रक्षाबंधन  का त्यौहार श्रावण मास के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। रक्षाबंधन  का त्यौहार युगों युगों से मनाया जा रहा है।

 

रक्षाबंधन कैसे मनाया जाता है।

 रक्षाबंधन  का दिन बहुत ही हर्सोल्लास का दिन होता है। इस दिन बहने सुबह ही स्नानादि करके नए वस्त्र पहनकर पूजा की थाली तैयार करती हैं, जिसमे वो कुछ पैसे, चावल हल्दी का मिश्रण, दीपक और राखी रखती हैं। भाई भी नए कपड़े पहन कर तैयार हो जाते हैं। फिर बहन भगवान के सामने भाई को चावल हल्दी का टीका लगाती हैं और उनके सिर पर भी छिड़कती हैं। उसके बाद पैसो से भाई की नज़र उतारती हैं और फिर दाहिने हाथ पर  रक्षाबंधन  को बांधती हैं। भाई बहन को  रक्षाबंधन  बांधने के लिए कुछ न कुछ उपहार देते हैं। इस दिन बाज़ारों में उपहार की खरीददारी के लिए काफी भीड़ लगती है।
 
 इस दिन घर मे पूजा पाठ का आयोजन भी किया जाता है। बहने भाई को  रक्षाबंधन  बांधने से पहले तक उपवास रखती हैं। घर मे अच्छे अच्छे पकवान बनते हैं और घर के सभी लोग एक साथ बैठकर भोजन करते हैं।
 
रक्षाबंधन  के त्यौहार में बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है। बाज़ार में अनेकों डिज़ाइन की राखी मिलती हैं। लेकिन ये त्यौहार महंगे राखी से ज्यादा प्रेम को महत्व देता है। रक्षाबंधन  का त्यौहार भाई बहन के प्रेम का त्यौहार माना जाता है। लेकिन ऐसा नही है कि ये त्यौहार सिर्फ भाई बहन के लिए ही है। कुछ जगहों पर ब्राह्मण लोग अपने यजमान को  रक्षाबंधन  बांधते हैं तो ब्राह्मण समाज मे कहीं कहीं पुत्री अपने पिता को,चाचा को मामा को आदि को  रक्षाबंधन बांधती है। इसे प्रेम का त्यौहार भी कहा जाता है। इस दिन लोग एक दूसरे से हंसी खुशी मिलते हैं और इस त्यौहार का आनंद लेते हैं।
 
इस दिन भाई अपने बहन के घर या बहन भाई के घर जाते हैं और रक्षाबंधन  का त्यौहार मनाते हैं। यह त्यौहार शांति का त्यौहार भी माना जाता है क्योंकि बाकी त्यौहार जैसे होली या दीवाली में कोई न कोई गलत कार्य लोग करते हैं लेकिन इस त्यौहार में कोई गलत कार्य नही करते हैं। यह त्यौहार छोटे बच्चो के साथ साथ बड़े लोगो के लिए भी बहुत ही उत्साह का त्यौहार होता है।
 
 समाज मे भी इस त्यौहार का बहुत महत्व है। देश के प्रधानमंत्री को बहुत औरतें रक्षाबंधन  बांधती हैं। और तो और औरतें अपने आस पास के बड़े लोगो को जिनको भाई के रूप में मानती हैं उनको रक्षाबंधन  बांधती हैं।
 
 RSS के लोग आपस मे भाईचारा के प्रदर्शन के लिए एक दूसरे को राखी बांधते हैं। और तो और पेड़ो को बचाने के लिए लोग पेड़ो को भी राखी बांधते हैं।

अगर भाई बहन दूर हों तो कैसे मनाये रक्षाबंधन ?

 हमारी दुनिया मे अब काफी ज्यादा टेक्नोलॉजी आ चुकी है। अगर आप दूर भी हैं तो भी आप एक दूसरे से बात कर सकते हैं। एक दूसरे का चेहरा देख सकते हैं। और तो और आप रक्षाबंधन  की राखी को डाक द्वारा देश या विदेश भी भेज सकते हैं। जो भाई बहन दूर रहते हैं वो एक दूसरे को  रक्षाबंधन  के बधाई संदेश और शायरियां भेजते हैं। बहन भाई के पास डाक द्वारा राखी भेज देती है। जिससे हमें दूर होकर भी एहसास होता है कि हम पास में ही हैं।

 

क्यों मनाते हैं रक्षाबंधन ?

 

 

 
 वैसे तो रक्षाबंधन  मनाये जाने के पीछे बहुत सारी पौराणिक कहानियाँ प्रचलित हैं। तो मैं एक एक करके वो सारी कहानियाँ बताता हूँ।
 
 

1) देवताओं और राक्षसों का युद्ध 

  
                                           एक बार की बात है। कुछ राक्षस ब्रम्हा जी से वरदान पा कर बहुत ज्यादा अहंकारी हो गए। उन्होंने सोचा कि वो अब स्वर्ग पर अपना अधिकार जमाएंगे और देवता लोगो को अपना गुलाम बना लेंगे। इसी सोच के साथ राक्षस लोगो ने देवता लोगो पर हमला बोल दिया। उन्होंने स्वर्ग के राजा इंद्र का सिंघासन जीतने के लिए पूरी कोशिश करना शुरू कर दिया। क्योंकि उनके पास वरदान था और तो और वो संख्या में भी बहुत ज्यादा थे तो युद्ध मे लगातार उनकी जीत हो रही थी और देवता लोग हार रहे थे।
                                           देवताओं के राजा इंद्र ने जब देखा कि उनकी सेना हार रही है, तो उनको डर सताने लगा और वो मदद की मांग के लिए बृहस्पति भगवान के पास गए। इधर ये सारी घटना को इंद्र की पत्नी इंद्राणी देख रही थीं। उन्होंने जब इंद्र को ज्यादा चिंतित देखा तो उन्होंने एक मंत्र पढ़ते हुए उनके कलाई पर रेशम का एक धागा बांध दिया। वो दिन श्रावण मास की पूणिमा का था। कहा जाता है कि वो धागा विजय का प्रतीक था और उसी की वजह से राजा इंद्र की सेना जीतने लगी। अंत मे देवताओं की जीत हुई और राक्षस हार गए ऐसा माना जाता है कि तभी से रक्षाबंधन  मनाया जाता है।
 

 

2) द्रोपदी और कृष्णा की कथा 

 
                                             महाभारत में बताया गया है कि एक बार राजा युधिष्ठर ने राजसेयु यज्ञ कराया। जिसमे उन्होंने अपने राज्य के आस पास के सभी राजाओं को आमंत्रित किया। राजा युधिष्ठर ने पास के राज्य चेदि के राजा शिशुपाल को भी आमंत्रित किया। यज्ञ में सभी राजा आये। शिशुपाल ने देखा कि इस यज्ञ में कृष्ण का ज्यादा सम्मान हो रहा है जबकि उनका कम। शिशुपाल को ये बात बुरी लगी और शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को गाली देना शुरू कर दिया।
                                               ये देखकर युधिष्ठर ने शिशुपाल को मारने का आदेश दिया लेकिन श्रीकृष्ण ने मना कर दिया। शिशुपाल गालियां देता रहा। जब शिशुपाल ने सौ गालियां दे दीं तो कृष्णा ने कहा शिशुपाल मैने तुम्हे 100 गालियां माफी का वचन दिया था। अब अगर गाली दोगे तो अच्छा नही होगा। शिशुपाल नही माना और उसने तलवार निकाल ली और अपशब्द कहते हुए आगे बढ़ा। कृष्ण ने उसे अपने सुदर्शन चक्र से मार दिया।
                                                मारते वक़्त उनके तर्जनी उंगली में चोट लग गयी। जिसको देखकर द्रोपदी ने अपनी साड़ी का किनारा फाड़ कर बांध दिया। द्रोपदी के इस प्रेम को देखकर श्रीकृष्ण ने वचन दिया कि कभी भी अगर तुम किसी समस्या में रहोगी और मुझे याद करोगी तो मैं तुम्हारी सहायता करने अवश्य आऊंगा।
                                               इस बात को काफी दिन बीत गए। जब पांडव द्रोपदी को जुएं में हार गए और द्रोपदी का चीर हरण होने वाला था तो उन्होंने श्रीकृष्ण को पुकारा। भगवान श्रीकृष्ण ने वचन दिया था। अतः वो सुनते ही सहायता के लिए दौड़ पड़े वो इतनी जल्दी में थे कि नंगे पैर बिना किसी सवारी के चल दिये। जब उनके वाहन गरुण ने उनको इस तरह भागते देखा तो उनके पास जाकर पूरी बात जानी। 
                                           गरुण ने कहा महाराज आप मुझ पर बैठ जाएं मैं आपको प्रकाश की गति से वहां पहुंचा दूंगा। गरुण ने ऐसा ही किया और श्रीकृष्ण ने समय पर पहुंच कर अपनी शक्तियों से द्रोपदी की साड़ी को इतना बड़ा कर दिया कि वो कभी खत्म ही न हो। दुःशासन जो द्रोपदी की साड़ी खींच रहा था वो परेशान हो गया और हार मानकर द्रोपदी की साड़ी खींचना बंद कर दिया। जिससे द्रोपदी की लाज बच गयी। जिस दिन द्रोपदी ने साड़ी को श्रीकृष्ण के हाथ पर बांधा था वो दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी कहा जाता है तभी से  रक्षाबंधन  मनाया जाने लगा और बहने भाई को रक्षाबंधन  बांध कर रक्षा का वचन लेने लगीं।
 
 

 

3) राजा बलि की कहानी 

 
                                          राजा बलि को कौन नही जानता ? उन्होंने लगभग तीनो लोको को जीत ही लिया था। जब राजा बलि ने 100 यज्ञ पूरे कर लिए और अब यह तय हो गया कि राजा बलि का अधिकार स्वर्ग पर भी होगा, तो राजा इंद्र चिंतित हो गए, और भगवान विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया जिसमे वो छोटे से बच्चे बन गए और उन्होंने राजा बलि से तीन पग जमीन मांगी। राजा बलि ने छोटा बच्चा जानकर तीन पग जमीन नापने को कहा। वो भगवान विष्णु थे तो उन्होंने एक पग में पृथ्वी दूसरे पग में पाताल नाप लिया और तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रख दिया। इसके बाद राजा बलि को रसातल(पाताल) में जाकर रहना पड़ा। 
                                               राजा बलि ने खूब प्रार्थना करके भगवान की भक्ति की और ये वरदान ले लिया की भगवान विष्णु हमेशा मेरे आंखों के सामने रहें। भगवान उनके सामने रहने लगे जिससे लक्ष्मीजी काफी चिंतित हो गईं। उन्होंने एक उपाय खोजा। वो राजा बलि के पास गई और उनको भाई कहते हुए रक्षाबंधन  बांध दिया और बदले में भगवान विष्णु को साथ ले आयीं। वो दिन श्रावण मास की पूर्णिमा का था। कहा जाता है कि इसी उपलक्ष्य में  रक्षाबंधन  का त्यौहार मनाया जाता हैं।
 
 

4) जैन धर्म की कथा 

 
                                          यह त्यौहार सिर्फ हिन्दू धर्म न नही अपितु जैन धर्म मे भी मनाया जाता है। जैन धर्म मे इस त्यौहार को मनाने का कारण हिन्दू धर्म से अलग है। जैन धर्म मे माना जाता है कि इस दिन मुनियों के राजा विष्णुकुमार ने लगभग 700 जैन धर्म के मुनियों की जान बचाई थी। इसी उपलक्ष्य में जैन धर्म मे  रक्षाबंधन  मनाया जाता है। जैन धर्म मे इस दिन लोग अपने धर्म और देश की रक्षा करने का प्रण लेते हैं।

भारत की स्वतंत्रता में रक्षाबंधन का महत्व

 
                                        ऐसा नही है कि रक्षाबंधन  सिर्फ बहन भाई को ही बांधती है। रक्षाबंधन  को एकता का प्रतीक भी माना जाता है। बात उन दिनों की है। जब भारत देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। भारत देश के सभी नागरिकों में एकता नही थी खासकर बंगाल में। 
                                        जब रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इस हाल को देखा तो उनके मन मे एक उपाय आया। उन्होंने लोगो को एक दूसरे को राखी बांध कर एक साथ होने का भरोसा दिलाने को कहा। जब लार्ड कर्जन ने बंग भंग कर दिया तो लोग एक साथ गंगा स्नान करके एक साथ इकट्ठे होकर एक दूसरे को राखी बांधने लगे जिससे लोगो में एकता का संचार हो गया। धीरे धीरे इसी के कारण पूरा देश एक होता चला गया और हमारा देश आजाद हो गया।
 

 

इतिहास में रक्षाबंधन की मुख्य घटनाएं

 
1) पहले के समय मे जब भी कोई राजा युद्ध के लिए जाता था तो उसका अच्छे से तिलक करके उसके हाथ मे एक धागा बांधा जाता था। माना जाता था कि वो धागा उनकी रक्षा करेगा और उनको युद्ध मे जीत दिलाएगा। यह परंपरा मुख्य रूप से मराठा लोगो मे थी।
 
2) एक बार की बात है। बहादुरशाह जफर ने मेवाड़ पर हमला कर दिया। उस वक़्त वहां की रानी कर्मावती थी। रानी को डर लगने लगा कि कहीं वो हार न जाएं। रानी ने उस वक़्त के मुगल राजा हुमायूँ के पास राखी भेजी और भाई के रूप में सहायता करने की मांग की। राजा हुमायूँ ने मुसलमान होते हुए भी रानी की बात का मान रखा और रानी की सहायता की। राजा हुमायूँ के सहायता से रानी कर्मावती की जीत हुई और उनका राज्य सुरक्षित हो गया।
 
3) कहा जाता है कि जब सिकंदर ने भारत पर हमला किया तो उनका सामना राजा पुरु से हुआ। सिकंदर की पत्नी ने राजा पुरु कोरक्षाबंधन  बांधा था और वचन लिया था कि वो उनके पति सिकंदर को युद्ध मे मारेंगे नही। राजा पुरु ने अपनी बहन के राखी का मान रखते हुए राजा सिकंदर को हराया तो लेकिन मारा नही।


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रक्षाबंधन 2021 : रक्षाबंधन कब है ? दिनांक, मुहूर्त और रक्षाबंधन का इतिहास

 

रक्षाबंधन 2021 : रक्षाबंधन कब है ? दिनांक, मुहूर्त और रक्षाबंधन का इतिहास

 

 

 

रक्षाबंधन 2021 : रक्षाबंधन कब है ? दिनांक, मुहूर्त और रक्षाबंधन का इतिहास

 

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