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HINDI KAHANIYAAN : MORAL STORIES IN HINDI कीमती हार (सुमेर की कहानियाँ) कहानी-16

कीमती हार

आज सुमेर की HINDI KAHANIYAAN में आप पढ़ेंगे KAHANI ‘मोती का हार’।

                          राजा सूर्यभान के राज्य में एक सेठ रहता था। वो अब बुड्ढा हो गया था और कुछ दिन बाद मर गया।
                        उस सेठ के दो बेटे थे। सेठ की मौत के बाद धन का बटवारा दोनों भाइयों में होने लगा। छोटे भाई ने कहा की सब बंटवारा हो गया लेकिन पिताजी का एक कीमती हार था उसका बंटवारा नहीं हुआ है। बड़े भाई ने कहा,” वो हार नकली था और मुझसे कहीं खो गया।” छोटे भाई ने कहा,”वो हार नकली नहीं था।” और बड़ा भाई अपनी ही बात पर था।बात बढती गयी, दोनों भाई न्याय के लिए राजा के दरबार में पहुंचे।

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                             राजा सूर्यभान का दरबार लगा हुआ था। राजा प्रजा की परेशानियाँ सुन रहे थे। छोटे भाई ने अपनी बात रखी। उसने कहा,” महाराज मेरे पिताजी का एक कीमती मोतियों का हार था। मेरा भाई उसमे से मुझे हिस्सा नहीं दे रहा है।” बड़े भाई ने कहा,” महाराज वो हार नकली था और मुझसे कहीं गुम हो गया।,” छोटे भाई ने कहा,” महाराज ऐसा नहीं हो सकता। जो अपने नौकरों तक को असली गहने देते थे, वो नकली हार क्यों बनवायेंगे ?  ये मेरे पिता की बेज्ज़ती कर रहा है।”
                            राजा ने पूरी बात सुनी लेकिन उन्हें भी नहीं समझ आ रहा था की क्या किया जाए। हार जब तक आँखों के सामने नहीं होगा तो कैसे कहें की हार नकली था या असली ? जब राजा को कोई रास्ता नहीं दिखा तो उन्होंने ये कार्य सुमेर को दे दिया। सुमेर ने दोनों से पूछताछ की और कहा की कल वो सभी संदूक लेकर आयें जिसमे उसके पिता अपने सभी बहुमूल्य वस्तुएं रखते थे।

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                           अगले दिन राजा के दरबार में दोनों भाई एक बार फिर आये। वो उन सभी संदूको के साथ आये थे जिसमे उनके पिता अपनी बहुमूल्य वस्तुएं रखते थे। सुमेर ने हर एक संदूक का बड़ी ही बारीकी से निरीक्षण किया। देखते देखते सुमेर की नज़र एक छोटी सी संदूक पर गयी। सुमेर ने पूछा,” सेठ जी इसमें क्या रखते थे ?” छोटे भाई ने कहा,” पिताजी इसमें वही हार रखते थे जिसे मेरा भाई नकली बता रहा है।” सुमेर ने बड़े भाई से पूछा तो उसने बताया,” हाँ पिताजी इसी संदूक में वो हार रखते थे लेकिन वो हार नकली था।”
                                 सुमेर ने पहले ही पता कर लिया था और उसे पता चल चुका था की सेठ कभी नकली जेवर नहीं बनवाता था। सुमेर ने राजा से कहा,” महाराज जो हार वो इस संदूक में इतना सुरक्षित रखते थे। वो नकली कैसे हो सकता है ? और वैसे भी वो सेठ थे कोई गरीब नहीं  की नकली हार को बचा कर रखते।”
                               बड़े भाई ने देखा की अब उसका झूठ पकड़ा जायेगा तो उसने अपनी गलती मान ली और कहा,” महाराज मेरे मन में पाप आ गया था। मै अपने छोटे भाई को उसका हिस्सा नहीं देना चाहता था। मै अब उसको उसका हिस्सा देने के लिए तैयार हूँ मुझे क्षमा करें।”

                               सुमेर के इस न्याय से राजा बहुत खुश हुए और तो और सभी दरबारी भी सुमेर की तारीफ़ करने लगे

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